साहित्य में व्यंग्य विधा
श्रीमती माग्रेट कुजूर
सहा. प्राध्यापक, हिन्दी, शासकीय महाविद्यालय, धरमजयगढ, जिला-रायगढ़ (छ.ग.)
शोध संक्षेपिका-
व्यंग्य हिन्दी साहित्य की अमूल्य विधा है,व्यंग्य विधा के माध्यम से हम सामाजिक,आथर््िाक,एवं राजनैतिक जीवन में व्याप्त विसंगतियांे पर सीधा प्रहार करते हैं। व्यंग्य जहाॅं हंॅसी के पुट विद्यमान होते हैं,वही वह व्यवस्था मंे व्याप्त समस्याओं को उजागर कर शासन प्रशासन का ध्यान समस्याओं की ओर इंगित करता है। आधुनिक समय मंे हमारे जीवन के हर क्षेत्र मंे समस्याएॅ इतनी बढ़ चुकी है, कि उन्हे प्रत्यक्ष कहना अपने आप मंे संभव नही है,ऐसी स्थिति में व्यंग्य एक बहुत बडा अभिकरन है। व्यंग्य ववस्था पर कटाक्ष है, यह समस्याओं को तार-तार कर अर्थात बडी बारीकी से प्रस्तुत करता है। ताकि स्रोता, पाठक या दर्शक देखकर, पढ़कर या सुनकर मनोरंजनात्मक हॅसी से लोटपोट होकर व्यवस्था में व्याप्त समस्याओं से साक्षत्कार कर लेता है, तथा व्यंग्यकार व्यंग्य के माध्यम से समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत करता है, यही कारण है, कि आधुनिक हिन्दी जगत में व्यंग्य का महत्व दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। ।
प्रस्तावना
व्यवस्था में व्याप्त गरीबी अपने आप में आज की संभवतः सबसे बडी समस्या है, इस समस्या से बडे-बडे साहित्यकार भी गुजरे हैं। तथा उन्होने बडी विवशता से अपनी साहित्य साधना को आगे बढाया है, “ मेरा जूता भी कोई अच्छा नही है। यों ऊपर से अच्छा दिखता है। अंॅगुली बाहर नहीं निकलती, पर अंगुठे के नीचे तला फट गया है। अँगुठा जमीन में घीसता है।और पैनी मिट्टी पर कभी रगड़ खाकर लहुलुहान भी हो जाता है।“
“मै समझता हूँ। तुम्हारी ऊँगली का इशारा भी समझता हूँ। और यह व्यंग्य मुस्कान भी समझता हूँ।“
भ्रष्टाचार आज हमारे में समाज मंे नासूर की तरह पैर पसारा हुआ है, लेकिन इसे समाप्त करने के सारे प्रयास धरे के धरे रह जा रहे हैं।
“जब चपरासी भी लाख रूपया खाने लगेगा, तब वह भी बर्खास्त नही होगा। ’कम्पलसरी रिटायरमेंट ‘पर बैठेगा।“
हमारे समाज में भाई-भतीजावाद चारो तरफ फैला हुआ है, जिसके कारण हमारा देश आगे नही बढ़ पा रहा है, “देखिए साहबवान ,हमारे मुल्क में भतीजावाद कैसे ऊपर उठता है।
वह बिना कुछ किये ऊपर उठता है। कोई साधारण आदमी उतना ऊपर नही उठता जितना भतीजा उठता है।”
आज हमारे देश के नेता जनता को लुभावने सपने दिखाकर चुनाव जीत जाते हैं, और जितने के बाद कभी जनता को दर्शन भी नही देते।
“पिछले चुनाव में भी आप जीते थे। उसके बाद पँाच सालो तक आपके दर्शन क्षेत्र में किसी को नहीें हुए। इस बीच अपने क्षेत्र के तीन भक्तों को भगवान के दर्शन हो चुके है, मगर आपके नही हुए। आप भगवान की तरह फालतू थोडे हीं हैं कि चाहे जिसे दर्शन दे दें।”
विश्व के कोने-कोने में दलाली व्यापक स्तर पर फैला हुआ है, और नित प्रतिदिन इसका प्रसार होता ही जा रहा है, इसी तरह आज पूँजी पति और धनाढ्य वर्ग के लोग अपने काले धन को विदेशों में छिपाकर रखते ही जा रहे हैं। ” पापा दलाली का क्षेत्र इतना विशाल और विश्व स्तर का है, कि दलाल कभी भूखों नही मर सकता। कमजोर-से- कमजोर दलाल की जेब में एक फर्म , पाँच नेता,एक स्विस बैंक खाता , दो मंत्री ,चार कार तथा बीस चमचे होते हैं। शेयर मार्केट से सब्जी मंडी तक,हथियारों की खरीद से लेकर नोबेल पुरूस्कार प्राप्त करने तक दलाल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रही, दलाली, वह पक्की है।“
आज हमारें देश के युवा किसी गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं, तो वह है, बेकारी और यह समस्या दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है।“ उनका खयाल है, कि इस बेचारे को पढ़ा -लिखा होने के बावजूद नौकरी नही मिलती । बडा खराब जमाना आ गया । एक वयोवृद्व अध्यापक सहज दया से कहते हैं-बेचारा खासा पढ़ा लिखा है। हिन्दी अच्छी लिख लेता है। पर इसे नौकरी नही मिलती । इधर रेडियो की शाखा खुली, तो उन्होने लोगों से कहा - अब इसकी नौकरी लग जायेगी। कुछ महीने बाद मुझसे पूछा- क्यों, नौकरी लगी?”
भारत की जनसंख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है, जो उत्पादन और उपभोग दोनों को भी बुरी तरह प्रभावित कर रही है। यदि बढ़ती हुई जनसंख्या पर नियंत्रण नही लगाया गया तो भारत को एक दिन भारी खाद्यन्न संकट से जुझना पड़ सकता है।” एक देश जिसकी जनसंख्या चालीस करोड़ है, और प्रति व्यक्ति भोजन आधा किलो है, विदेश से चार किलो टन अनाज मँगवाता है। यदि उस देश में कृषि उत्पादन न बढ़े और प्रति व्यक्ति भोजन की खपत पौन किलो हो जाए तो उस देश को तीन वर्ष बाद विदेश से कितना अनाज मँगाना होगा, जबकि उस देश की जनसंख्या प्रतिवर्ष दस प्रतिशत बढ़ती है।”
आज हमारें देश के पूँजी पतियों एवं व्यापारियां ने वस्तुओं के मूल्य को इतना अधिक बढ़ा दिया है, कि आम जनता मंहगाई की समस्या से त्रस्त है। जिसे कम करने के हर सरकारी प्रयास विफल ही हो रहे हैं।” प्रधानमंत्री ने कहा - मेरा विश्वास न अर्थशास्त्र में है, न प्रशासकीय, कार्यवाही में । यह गाँधी का देश है। यहाँ हृदय परिवर्तन से काम होता है। मैं व्यापारियों से नैतिकता की अपील कर दूँगा। वे कीमतंे एकदम घटा देगें। अपील से उनके दिलों में मैं लोभ की जगह त्याग फिट कर दूँगा। मै सर्जरी भी जनता हूँ।“
हिन्दी हमारी मातृ भाषा है, लेकिन अंगे्रजी के प्रभाव में आकर दिनप्रति दिन इसकी दशा खराब होती जा रही है, और आज हिन्दी भाषी लोग भी बोल चाल में अंग्रेजी का प्रयोग करना अपना शान समझते हैं।“ मैं हिन्दी लेखक हूँ। मेरी मौत इसलिए होती कि अंग्रेजी की चेतावनी ड्राइवर ने नहीें ली। अँगरेजी में चेतावनी लेकर जीने से मरना बेहतर है। अगर मैं रेलगाड़ी के सामने गिरकर मरने पर उतारू हूँ और कोई कहे-मृत्यु का वरण मत करों, तो मैं नही मरूँगा पर कोई कहे -’डोंट डाई’ तो मैं फौरन मर जाऊँगा। भाषा पहले, प्राण बाद में। प्राणों से ज्यादा भाषा प्यारी होती है क्योंकि मुर्दा भी तो मातृ भाषा की जय बोलता है। इसलिए बहुत - सी बातें मुर्दों को ध्यान रखकर की जा रही है।
इस प्रकार हमारें व्यंग्य विधा के साहित्यकारों ने हमारें देश के व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को व्यंग्य के माध्यम से उजागर किया है, और हम इन विसंगतियों से, अपने के जीवन हर क्षण को गुजार रहे हैं। चाहे वह मंहगाइ, भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद ,बेकारी ,रिश्वतखोरी आदि हो। तथा इन विसंगतियों ने हमारी पूरी व्यवस्था को हिला कर रख दिया है, लाचार बना दिया है।
संदर्भ सूची:-
1 हरिशंकर परसाई, प्रेमचंच के फटे जूते पृष्ठ- 34,35
2 हरिशंकर परसाई, काग भगौड़ा-साहब महत्वकांक्षी पृष्ठ- 33
3 शरद जोशी, हम भ्रष्टन के भ्रष्ट,सरकार का जादू पृष्ठ- 37
4 हरिशंकर परसाई, शिकायत मुझे भी है, जीते हुए उम्मीद्वार के नाम पृष्ठ- 77
5 सं. गिरजाशरण, सामाजिक व्यवस्था पर व्यंग्य, दलाली पृष्ठ- 82
6 हरिशंकर परसाई, शिकायत मुझे भी है, चुनाव और सुशील लेखक पृष्ठ-73
7 शरद जोशी, यत्र तत्र सर्वत्र पृष्ठ-201
8 हरिशंकर परसाई, विकलांग श्रद्वा का दौर, एक अपील का जादू पृष्ठ-55
9 हरिशंकर परसाई, शिकायत मुझे भी है, शहादत जो टल गई पृष्ठ- 67
Received on 18.11.2014 Modified on 05.12.2014
Accepted on 21.12.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 2(4): Oct. - Dec., 2014; Page 233-234