भारत में संसदात्मक शासन की मूलभूत उपलब्धियाँ
डाॅ जी.एस. धु्रवे
सहायक प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान,शास. महाविद्यालय पथरिया, मुंगेली (छ.ग.)
प्रस्तावना
संसद का उद्देश्य ही सामाजिक बदलाव रहा है। समाज की सामाजिक गतिविधियों की सुचारूता तभी सफलतापूर्वक गति करती है, जब उसका आर्थिक पक्ष मजबूत होता है, और संसदीय प्रयोजनों का एक लक्ष्य समाज को आर्थिक रूप से सशक्त करना भी है। विकास का आधार संसदीय लोकतंत्र से ही तो शुरू हो रहा है, क्योंकि- ‘‘भारत में विकास संबंधी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है। यदि संसदीय प्रणाली सामाजिक प्रयोजनों की पूर्ति में कारगर नहीं होती है, तो लोकतंत्र की अन्य प्रणालियों को आजमाया जा सकता है। सरकार का स्वरूप कुछ भी हो, काम तो आमतौर पर नौकरशाही तंत्र ही सम्पन्न करता है। अतः विकास संबंधी प्रयोजनों की पूर्ति के लिए संसदीय तंत्र के साथ नौकरशाही तंत्र का मजबूत होना भी जरूरी है।’’1
भारतीय संविधान ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि राज्य का मतलब ही लोगों को सभी प्रकार से राहत प्रदान करना है। राज्य नागरिकों के लिए है। नागरिक राज्य के उपभोग की वस्तु नहीं है। भारतीय संविधान की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस संभावना को कतई समाप्त कर दिया गया है।
संविधान के भाग 4 में जो नीति निर्देशक सिद्धांत अंकित किये गये हैं, उनके द्वारा राज्य को निर्देशित किया गया है कि राज्य अपने नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक न्याय प्राप्त कराने के लिए आवश्यक वैधानिक एवं प्रशासकीय पहल करें, क्योंकि- ’’सामाजिक-आर्थिक न्याय संबंधी लक्ष्यों की बेहतर पूर्ति को दृष्टिगत रखते हुए संविधान में राज्य की कल्पना एक कल्याणकारी राज्य के रूप में की गयी है, जो समाज के सभी वर्गो के लोगों को सामाजिक न्याय सुनिश्चित करेगा, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं जीविकोपार्जन के लिए तथा उन्हें निर्वाहयोग्य मजदूरी प्रदान कराने के लिए आवश्यक पहल करेगा। साथ ही कमजोर वर्गो, विशेष रूप से श्रमिकों, बच्चों, वृद्धों एवं शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण कार्यक्रमों को लागू करेगा।2
संविधानिक व्यवस्था के अंतर्गत अनुच्छेद 41 के द्वारा व्यवस्था की गयी है कि राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और अपनी सीमाओं के अनुरूप अपने नागरिकों को बेराजगारी, बीमारी, असमर्थता तथा अन्य प्रकार की अशक्तता की अवस्था में काम-काज तथा शिक्षा एवं सार्वजनिक सहायता के अधिकार प्राप्ति की व्यवस्था करे। इस प्रकार संविधान का अनुच्छेद 42 कार्य की उपयुक्त मानवोचित दशा तथा मातृत्व लाभ सुनिश्चित करने से संबंधित है। इस स्थिति से सामाजिक बदलाव के नये सोपानों का मुखर होना स्वाभाविक ही है। आर्थिक बदलाव के संदर्भ में अनुच्छेद 43 को अग्रसारित किया जा सकता है, क्योंकि संबंधित अनुच्छेद व्यवस्था करता है कि राज्य उपयुक्त विधान, आर्थिक संगठन या अन्य किन्हीं माध्यमों से सभी श्रमिकों, चाहें वे कृषि श्रमिक, औद्योगिक श्रमिक अथवा अन्य किसी भी प्रकार के श्रमिक हों, के लिए कार्य, निर्वाह योग्य पारिश्रमिक तथा कार्य के लिए समुचित दशाएं उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा, जिससे कि उनके लिए उत्तम जीवन स्तर, अवकाश के पूर्ण उपयोग तथा सामाजिक व सांस्कृतिक अवसर सुनिश्चित हो सकें। इसी क्रम में संविधान का अनुच्छेद 45 राज्य के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रबंध किये जाने से संबंधित है।3
संसद के माध्यम से क्रियान्वित किये गये सांविधानिक प्रावधानों के द्वारा सामाजिक बदलाव के पीछे वे अधिकार थे, जिनकी पूर्ति न होने पर भारी अराजकता अथवा क्रान्ति की स्थिति की कल्पना समाज व सत्ता के ठेकेदारों को भय दिखा रही थी। भारतीय दलित एवं पिछड़ा हुआ व्यक्ति उस हथियार से परिचित हो चुका था, जिसका प्रयोग भारतीयों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूद्ध किया था। आज भी यदि संविधान प्रदत्त अधिकारों की अनेदेखी की जाती है, तो स्थिति भयंकर रूप धारण कर लेती है। अनुच्छेद 46 के समर्थन में कुछ अन्य प्रावधान भी है, जो सामाजिक परिवर्तन के निमित्त जनता को तैयार करते हैं। राज्य द्वारा पोषित अथवा राज्य निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षण संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल, धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा अथवा इनमें से किसी भी आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा। शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का विशेष अधिकार गैर सरकारी रूप से संचालित संस्थाओं को भी प्रदान किया गया। धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गो को अपनी रूचि की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का अधिकार होगा। शिक्षण संस्थाओं को सहायता प्रदान करने में राज्य किसी संस्था के विरूद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक वर्ग के प्रबन्धन में हैं।4
संसदीय शासन प्रणाली में दोहरी कार्यपालिका का तत्व विद्यमान रहता है, जिसका मतलब है कि सांविधानिक दृष्टि से राज्य के प्रमुख के पास तमाम शक्तियां केन्द्रित रहती हैं, किंतु व्यवहार में उसकी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिगणों द्वारा क्रियान्वित होता है। संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में व्यवस्थापिका और कार्यपालिका एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित होती हैं तथा वे अपनी नीतियों व कार्यो के लिए व्यवस्थापिका के प्रति पूरी उत्तरदायी होती हैं। इसमें संसदीय सदस्यता अपरिहार्य होने के कारण उसका उत्तरदायित्व सामूहिक तथा व्यक्तिगत, दोनों प्रकार का होता है। उल्लेखनीय है कि मुख्य कार्यपालिका, जिसे मंत्रिमण्डल के रूप में जाना जा सकता है, मुख्यतः निम्न सदन से ही निर्मित होती है, जो इस सदन के प्रति उत्तरदायी है। ये सभी साथ डूबते तथा तैरते है। उल्लेखनीय है कि इस पद्धति में सरकार तथा अन्य घटकों पर संसद की सर्वोच्चता रहती है अर्थात संसद ही शक्ति का केन्द्र बिन्दु बनी रहती है।5
संसदीय लोतांत्रिक शासन व्यवस्था में भले ही शक्ति का केन्द्रबिन्दु संसद बनी रहे, लेकिन यह शक्ति पराये हाथ के धन के समान होती है, जिसका यह भरोसा नहीं किया जा सकता कि समय पड़ने पर वह सौ फीसदी काम आ ही जाएगी। चूंकि लोकतंत्र की शक्ति मत होता है, और मतदाता प्रत्येक नागरिक है। इस प्रत्येकता को अपने प्रति आकर्षित किये रखने के निमित्त समानता के धरातल पर खड़ा होना भी पड़ेगा और दूसरों को खड़ा हुआ देखना भी पड़ेगा। यह एक किस्म की राजनीतिक विवशता ही कही जाएगी। इस विवशता की वास्तविकता है कि कार्यपालिका के कार्यकाल की अवधि निश्चित होने पर भी अनिश्चित ही होती है, अर्थात कार्यपालिका उस समय तक ही सत्तारूढ़ रहती है, जब तक इसका निम्न सदन में बहुमत रहता है तथा विश्वास प्राप्त रहता है। इस विश्वास को जीतने तथा बनाये रखने के लिए जिस मतदाता की आवश्यकता होती है, वह असमानता के धरातल पर खड़ा होकर प्राप्त नहीं हो पाता। इसके लिए ही संविधान में कमजोर वर्गो की सुरक्षा की व्यवस्था रखी गयी। डाॅ. मनोज कुमार सिंह के शब्दों में कहें, तो ‘‘शोषित, दलित, पिछड़े और स्वाधीन भारत में भी लगभग पराधीन जैसा जीवन व्यतीत कर रहे लेगों के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक विकास की दृष्टि से सरकारों ने अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के नये वर्ग गठित किये हैं। इस प्रकार भारतीय समाज दो वर्गों में बंट गया है। एक ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज तथा दूसरा गैर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज।’ इस दूसरे समाज द्वारा दी जाने वाली मंत्रणा और किये जाने वाले अत्याचार तथा शोषण से मुक्ति की दिशा में अनेक कानूनी उपाय किये गये। सर्वप्रथम भारत सरकार अधिनियम 132 के पारित होने के बाद अनुसूचित जातियों का एक वर्ग पृथक अनुसूची में दर्शाया गया। इस सूची में देश के विभिन्न भागों की उन जातियों का समावेश किया गया, जो अस्पृश्य मानी जाती थी।16
कहना न होगा कि सरकार द्वारा जो योजनाएं परियोजनाएं समाजोत्थान के लिए चलायी जाती हैं, उनके लिए बहुत जरूरी है जनजागृति का कार्य करना। सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक परिवर्तन के संदर्भ में संसद द्वारा किये गये प्रयास यद्यपि सार्थक हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर देखें, तो इन प्रयासों के साथ-साथ एक समानान्तर अव्यवस्था अथवा असमानता भी हमारी संसद द्वारा चलायी जा रही है। समाज में परिवर्तन तो इसलिए दृष्टिगोचर हो रहा है, कि जहाँ पहले कुछ था ही नहीं, वहाँ अब कुछ हो जाने से बदलाव दिख रहा है। लेकिन जहाँ पहले से ही सबकुछ था, वहाँ तो और भी ऊॅंचाई हो जाने से ऐसा लगता है कि इस ऊॅंचाई के सामने शेष प्रयास होना भी न होने जैसा लगता है। समाज के आम आदमी का बच्चा ऐसे स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए विवश है, जहां न तो पूर्ण रूप से योग्य शिक्षक हैं और न ही वहाँ का वातावरण ऐसा है, जो अध्ययन सफल हो सके। दूसरी तरफ उच्च वर्ग के बच्चे ऐसी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जहाँ एक-एक विषय के लिए कितने-कितने विषय विशेषज्ञ उपलब्ध हैं। उनके लिए शैक्षणिक वातावरण भी उम्दा किस्म का होता है। ऐसे में दोनों जगहों के शिक्षा प्राप्त नागरिकों में समान अवसर की बात करना सिर्फ धोखा देना है, जबकि प्रत्येक परिवर्तन का आधार शैक्षिक योग्यता पर खड़ा होता है। इस संदर्भ में नोबेल पुरस्कार प्राप्त भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अमत्र्यसेन का मानना है कि- ‘‘सरकार को अपने सीमित साधनों का उपयोग मूलभूत अधोसंरचना के विकास में करना चाहिए। अर्थशास्त्र का सीधा संबंध निर्धन और अशिक्षितों के जीवन से होना चाहिए। उन्होनें बुनियादी शिक्षा को मौलिक अधिकारों का दर्जा देने और स्वास्थ्य सेवाओं में और अधिक निवेश करने को कहा है। उनका मानना है कि सामाजिक विज्ञान मूल्यनिरपेक्ष नहीं हो सकता। यदि वे सिर्फ मानव व्यवहार का अध्ययन करते हैं, तो इसकी भी उपयोगिता है, लेकिन समाज वैज्ञानिकों का काम यह बतलाना भी है कि मानव-व्यवहार की कौन सी चीजें रक्षणीय है और कौन सी त्याज्य हैं।7
किसी भी समाज में कोई भी बदलाव सम्पूर्ण समाज को प्रभावित करता है। अस्तु, संसद के माध्यम से स्वतंत्र भारत में जो परिवर्तन हुआ है, उससे न केवल पुरूष वर्ग ही प्रभावित हुआ है, बल्कि महिलाएं भी इससे प्रभावित रही हैं और उनकी स्थिति में भी बदलाव आया है। उल्लेखनीय है कि भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति दोहरी पराधीनता की स्थिति जैसी थी। जहाँ शासकीय पराधीनता का प्रभाव उन पर था, वहीं उनके परिवारों में भी उनकी स्थिति गहरी पराधीनता की थीं। उसके मुख में जुबान होते हुए भी उसे रूढ़ियों ने मूक बना दिया था। उसके लिए तमाम व्यवस्थाएं पुरूष द्वारा तय की जा रही थी। पर्दा प्रथा, बालविवाह, सती प्रथा, अशिक्षा, चहारदीवारी में कैद नारी मानों पालतू पशु की मानिंद थी। स्वतंत्रता के उपरांत उसकी स्थिति में उस समय सुधार होना शुरू हुआ, जब उसके लिए शिक्षा के प्रावधान किये गये, तथा नर व नारी में सांविधानिक रूप से कोई भी भेदभाव नहीं किया गया। इसी का प्रतिफल है कि-आज की नारी पुनः समानता के युग की तरफ बढ़ रही है। कानून द्वारा स्त्री को पुरूष की तरह समानता का अधिकार प्राप्त है। युगों से चले आ रहे शोषण को न केवल समाज स्वयं ही समाप्त कर रहा है, वरन् स्वयं नारी ने भी शोषक साधनों को समाप्त करने का बीड़ा उठाया है। लड़कियों में समानता के अधिकार की भावना जड़ पकड़ती जा रही है। कोई भी क्षेत्र हो सामाजिक, राजनीतिक, तकनीकी, प्रशासनिक, धार्मिक, आर्थिक, सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने अपने पैर जमाने प्रारंभ कर दिये हैं। समाज ने भी स्त्री के प्रति पहले की अपेक्षा उदार दृष्टिकोण अपनाना प्रारम्भ कर दिया है। कुछ उद्योगों और व्यवसायों में तो वे अपना एकाधिकार भी स्थापित करने लगी है, जैसे-नर्सिंग, वस्त्र और फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में, घड़ी के कारखानों में, टेलीफोन आॅपरेटरी तथा टाइपिंग आदि। इस प्रकार स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त करके तथा स्वालम्बी बनकर इन कहावतों, याथा-योग्यता केवल पुरूषों में या ‘वे केवल घर के कामों के लिए ही बनी हैं। आदि को झूठा साबित कर रही हैं।8
स्वाभाविक रूप से कहा जा सकता है कि राजनीतिक व सामाजिक आजादी के कारण सामाजिक व राष्ट्रीय मंचों से स्त्री-समानता की उद्घोषणाएॅं सुनने को मिलने लगी हैं, और अब वह नारी, जो केवल परिवार के नेतृत्व करती थी, प्रदेश तथा देश का भी नेतृत्व कर रही है। इसीलिए-कुछ वर्षो पूर्व केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया था कि न्यायालयों में नियुक्ति के लिए उपयुक्त महिलाओं का पता लगाएं, ताकि उन्हे न्यायपालिका में समुचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके। इस समय देश के विभिन्न न्यायालयों में कितनी ही महिला न्यायाधीश सफलतापूर्वक कार्यरत हैं।11
वस्तुतः अब महिलाएॅं भी पुरूषों के समान ही मानवाधिकार और कानून के समक्ष समान हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भारत में संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया गया,? जिसमें विधि के समक्ष समता के अधिकार को सर्वाग्रणी रखा गया। भारतीय गणराज्य की बुनियाद में कल्याणकारी राज्य की कल्पना, आधारशिला के रूप में की गयी है, जिसका प्रमाण है भरतीय संविधान की प्रस्तावना। इस प्रस्तावना में ही अन्य बातों के अतिरिक्त सामाजिक और आर्थिक न्याय, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प अंगीकार किये गये। इस प्रकार विधि की दृष्टि में महिला और पुरूष में कतई भेद नहीं किया गया। इसी के तहत महिलाओं के जीवन में विकास के लिए भारतीय संविधान में अनेक कानूनी प्रावधानों के द्वारा महिलाओं को संरक्षण प्रदान किया गया है।
महिलाओं को कानूनी संरक्षण के निमित्त भारतीय दण्ड विधान में ‘‘धारा 222(ए) में व्यवस्था है कि बलात्कार तथा तत्संबन्धी अपराधों की शिकार महिला का नाम-परिचय, जाँच अधिकारी की सद्भावनापूर्ण अनुमति, संबंधित महिला की अनुमति और न्यायाधीन मामलों में न्यायालय की अनुमति के बिना प्रकाशित नहीं किया जा सकेगा। धारा 304 (बी) में दहेज मृत्यु तथा धारा 498 (ए) में विवाहित स्त्री के प्रति उसके पति या निकट संबंधियों द्वारा की जाने वाली कूंरता दण्डनीय अपराध है। धारा 306 में स्त्री को आत्महत्या के लिए उकसाना दण्डनीय अपराध है। धारा 312 से 316 में अवैध गर्भपात कराने से संबंधित दण्डनीय अपराध का प्रावधान है। धारा 259 से 263 में स्थित्रयों को अपहरण, अवयस्क बालिकाओं को कुत्सित प्रयोजन के लिए हासिल करने, विदेश भेजने, गुलामी के लिए खरीदने-बेचने, वेश्यावृत्ति के लिए बाकिाओं को खरीदने-बेचने का दण्डनीय अपराध में शुमार किया गया है।’’10
वस्तुतः संसद के माध्यम से भारतीय समाज में स्वतंत्रता के बाद प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है, लेकिन समय, साधन, शक्ति और सत्ता की दृष्टि से देखा जाये, तो यह बदलाव तुलनात्मक रूप से उस सीमा तक नहीं हो पाया, जितना होना चाहिए था। आजादी के छः दशकों से भी अधिक समय बीतने पर आज भी हम आरक्षण की बैसाखियों का सम्बल टटोल रहे हैं। सामाज की स्थिति यह है कि रोजगार योजनाओं में काम के बदले एक सौ रूपये प्रतिदिन मजदूरी दी जा रही है। यह बात समझ से परे है कि वोट बटोरने मात्र की नीयत से जो धोखा जनता को दिया जा रहा है, आखिर इसका परिणाम क्या होगा। शासन-प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में काम करने वालों की कमी खूब है। न तो शिक्षक पूरे हैं, न लिपिक न सिपाही पूरे हैं, न अफसर, सब जगह रिक्तियाँ है, लेकिन उनकी पूर्ति को सियासी मुद्दा बनाकर चुनाव जीतने की कूटनतिक चालें चलकर, संसद और संविधान की मार्यादाओं को नीलाम किया जा रहा है।
भारत में संसद के माध्यम से विकास के द्वारा जो बदलाव हुआ है, उसके आरंम्भिक दौर पर दृष्टिपात करें, तो पता चलता है कि इस काल में सामाजिक विकास से आशय आर्थिक विकास से था तब सामाजिक बदलाव जिस विकास पर खड़ा था, उसका परिचायक सकल राष्ट्रीय उत्पाद, औसत राष्ट्रीय आय या प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि को माना जाता था। आगे चलकर इसमें आर्थिक विकास के साथ सामाजिक कल्याण तथा सामाजिक सेवाओं-शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में सुधार एवं विस्तार का भाव भी जुड़ गया, जिससे इस दौर में सामाजिक विकास के परिचायक केवल आर्थिक ही नहीं रह गये, अपितु इनमें व्यक्ति की बुनियादी आवश्यकताओं, जैसे-भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं रोजगार आदि की पूर्ति तथा व्यक्ति की शारीरिक गुणवत्ता उदाहरण के लिए पोषण स्तर, जीवन प्रत्याशा, शिशु-मृत्यु दर, साक्षरता आदि में सुधार जैसे परिचायक भी जुड़ गये। सामाजिक विकास की अवधारणा में सामाजिक न्याय एवं मानव व्यक्तित्व की गरिमा की रक्षा का भाव भी जुड़ गया। परिणामस्वरूप समाज में सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े व कमजोर वगों-अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्गो तथा महिलाओं व बच्चों की लक्ष्य समूह के रूप में पहचान की गयी और उनकी निर्योग्यताओं को दूर करके उन्हें आवश्यक सुरक्षात्मक संरक्षण प्रदान करने तथा उनकी आर्थिक स्थिति को प्रारम्भिक रूप से निर्धनता रेखा के ऊपर अथवा औसत राष्ट्रªीय आय से यदि ऊपर नहीं हो तो कम से कम उसके समकक्ष लाने का प्रयास तो किया ही गया है।
संदर्भ सूचीः
1. एस.पी. कश्यप: आॅनेस्ट एफर्ट नीडेड फाॅर सोशल जस्टिस, कुरूक्षेत्र 38(1), 1990 पृ.-37-41
2. आर.पी. सिंह: भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं सामाजिक समस्याएॅं, मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, 1987, पृ.-42
3. रामगोपाल सिंह: सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और जाति व्यवस्था, रावत पब्लिकेशंस, जयपुर, 1999, पृ.-2
4. गार्नर, जेम्स विलफोर्ड: पाॅलिटिकल साइंस एंड गवर्नमेंट, वयर्ड प्रेस कलकत्ता, 1951, पृ.-296
5. डाॅ. बी.एन.बर्नेः ऐनालिसिस आॅफ सिस्टम, फ्री प्रेस, न्यूयार्क, 1959, पृ-44
6. डाॅ. मनोज कुमार सिंह: भारत में सामाजिक परिवर्तन, आदित्य पब्लिशर्स, बीना (म.प्र.), 2000, पृ.-12
7. डाॅ. मनोज कुमार सिंहःभारत में सामाजिक परिवर्तन, आदित्य पब्लिशर्स, बीना (म.प्र.) 2000 पृ. 16
8. डाॅ. मनोज कुमार सिंहःभारत में सामाजिक परिवर्तन, आदित्य पब्लिशर्स, बीना (म.प्र.) 2000 पृ. 39
9. डाॅ. मनोज कुमार सिंहःभारत में सामाजिक परिवर्तन, आदित्य पब्लिशर्स, बीना (म.प्र.) 2000 पृ. 40
10. प्रदीप त्रिपाठीः मानवाधिकार और भारतीय संविधान, संरक्षण एवं विश्लेषण, राधा पब्लिकेशंस नई दिल्ली, पृ. -112
Received on 09.04.2015 Modified on 18.05.2015
Accepted on 10.06.2015 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 3(2): April-June, 2015; Page 92-96