Author(s): प्रियांकी गजभिये

Email(s): priyankirjn7910@gmail.com

DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00022   

Address: प्रियांकी गजभिये
सहायक प्राध्यापक (इतिहास विभाग), शास. बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्नातकोततर महाविद्यालय, डोंगरगॉव, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़, भारत।
*Corresponding Author

Published In:   Volume - 14,      Issue - 2,     Year - 2026


ABSTRACT:
“सरल होना कठिन है“ यह युक्ति आदिम समुदायों पर यथोचित लागू होती है। उनका प्रकृति से एक आध्यात्मिक जुड़ाव और उनकी मान्यताओं के अनुरुप पराशक्तियों से उनका सीधा सम्पर्क जनजातियों का प्रकृति के साथ एक सतत् संवाद और तादात्म्य स्थापित करता है। और यही उनकी सरलता का आधार है। सरल समाजों की समस्त सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ उनकी धार्मिक मान्यताओं के इर्द-गिर्द ही निहित है। जनजातियों की धार्मिक संस्थाएँ उनके लिए पूजा-पाठ मात्र का केन्द्र नहीं है अपितु वह उनकी संपूर्ण जीवन शैली को ही संचालित करती है।1 आदिम समुदायों की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ भी उनकी धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओं की ही संवाहक है। परन्तु वर्तमान परिदृश्य में उनकी धार्मिक और सामाजिक संस्थाएँ एक भयानक संकट के दौर से गुजर रही है।2 सरल समाजों के लिए यह संकट इतना भारी है कि जनजातियों की पहचान और उनकी जनजातीय विशिष्टताएँ तेजी से विलुप्तता की ओर अग्रसर हैं। इस गहराते संकट से आदिवासी समाज तो जूझ ही रहा है, सरकार शासन और प्रशासन के लिए भी यह एक चुनौति है। राष्ट्रीय परिदृश्य में ऐसे सरल समाजों जिनके जीवन में पवित्रता, सरलता और भोलापन ही जीवन का विधायक प्रतिमान हो, ऐसे सरल समुदायों का अनुरक्षण करना किसी भी राष्ट्र के लिए एक नैतिक जिम्मेदारी होना चाहिए।


Cite this article:
प्रियांकी गजभिये. संकट के दौर में जनजातीय धर्म और परम्पराएँ. International Journal of Advances in Social Sciences. 2026; 14(2):102-0. doi: 10.52711/2454-2679.2026.00022

Cite(Electronic):
प्रियांकी गजभिये. संकट के दौर में जनजातीय धर्म और परम्पराएँ. International Journal of Advances in Social Sciences. 2026; 14(2):102-0. doi: 10.52711/2454-2679.2026.00022   Available on: https://www.ijassonline.in/AbstractView.aspx?PID=2026-14-2-7


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50. तिवारी, कनक, आदिवासी उपेक्षा की अर्न्कथा, ब्रिटिश हुकुमत से इक्कीसवीं सदी तक, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. 365

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